उज्जैनजीवनशैली

सेक्स और प्रेम प्राकृतिक

विवाह सभ्यता और समाज की देन।

उज्जैन।डॉ अरुण वर्मा.प्रेम और सेक्स का किसी धर्म से कोई लेना देना नहीं होता है,,,ना ही प्रेम में जेंडर मैटर काम करता है,,,प्रेम की भावना उत्पन्न करने वाला आॅक्सिटोसिन हार्मोन हिंदु और मुसलमान या किसी भी जाति में समान रूप से निकलता है,,,सेक्स के हार्मोन प्रोजेस्टेरोन इस्टरोजेन भी हिंदु मुस्लिम देखकर कर स्रावित नहीं होते हैं,,,इन हार्मोन्स का निकलना एक बायलोजिकल प्रोसेस है, जो एक निश्चित आयु होने पर सभी ह्यूमन बीइंग के अंदर क्रिएट होने लगते हैं,,,इन हार्मोन्स का क्रिएशन कोई हिजाब कोई घूंघट कोई शर्म कोई संकोच नहीं रोक सकता है।

अगर कोई कहे प्रेम हमारी संस्कृति नहीं है तो,,,,यह गलत है,,,अगर कोई हिजाब पहना कर प्रेम के वेग को रोकने की बात करता है तो वो अमानवीय है।
अगर कोई संस्कृति के नाम पर युवाओं को लठ्ठ मारने की बात करता है तो वो क्रूर है,,,,ऐसे व्यक्ति क्या अपने अंदर होने वाले हार्मोनल सीक्रेशन को रोक सकता है।
इंसान जब पहली बार पृथ्वी पर अस्तित्व में आया तो उसने सबसे पहले दो काम करें,,,,एक पेट की भूख मिटाई और दूसरा शरीर की भूख मिटाई,,,,और इन्हीं दो भूख की परिणिति ही है जिससे मानव जाति की निरंतरता बनी हुई है,,, सृष्टि में पृथ्वी के आरम्भ में ना कोई समाज था ना कोई कानून था,,,, पृथ्वी के आरंभिक काल में संतान पैदा करने के लिए किसी निकाह किसी विवाह का कोई सिस्टम नहीं था,,,जो नर ज्यादा बलशाली होता था वो मनपसंद मादा पर अधिकार जमा कर उसे हासिल कर लेता था,
फिर मानव धीरे धीरे सभ्य हुआ उसका मस्तिष्क विकसित हुआ तो उसने समाज बनाया कानून बनाया,,,
यह निकाह शादी विवाह इसी सभ्यता और समाज की देन है,,,, लेकिन सेक्स,प्रेम प्रकृति की देन है,,,,,समाज के नियम परिस्थितियों के अनुसार बदले जा सकते हैं लेकिन प्रकृति को नहीं बदला जा सकता है,,,,अगर मनुष्य प्राकृतिक चीजों को बदलने की कोशिश करेगा तो वो विकृत हो जायेगा।
आज यही हो रहा है मनुष्य प्राकृतिकता को बदलना चाहता है और उसे रोकना चाहता है,,,,,यही क्रियाकलाप मानव मस्तिष्क को विकृत कर रहे हैं,,,,मानसिकता को दूषित कर रहे हैं। हमें इस संदर्भ में संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों पर भी विचार करना चाहिए, संकीर्णता और तानाशाही से आप कथित सुधार नहीं कर सकते।

Related Articles

Back to top button
vvanews
Close