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“पोस्ट रिटायरमेन्ट प्लान”

पहचान छुपाकर जीवन जीना कठिन होना होता है ऐसा करना भी पड़े तो जरूरी कोई विशेष स्थित में ही होता होगा। ऐसी ही कोई बात ऐबीसीजी के साथ रही होगी। ऐबीसीजी हकीकत में एक तेजस्वी व्यक्ति थे जो शौक से कई भाषाएँ जानते थे। ये अजीबोगरीब शौक पाले हुए शख्स का संक्षिप्त नाम था जिसे वक्त ने अवध बिहारी चतुर्वेदी से ऐबीसी बना दिया था। हुआ यों कि अवध जी ने कुछ भाषाओं में एम.ए. करते हुये अच्छी सी शासकीय नौकरी प्राप्त कर ली। फिर खुफिया विभाग में जाने का सोचने लगे, रोमांचक जीवन के सपने बुनने लगे। कई बार दाढ़ी मूछो हेयर स्टाईल को बदलते रहते। कभी चोला पहनते तो कभी मंकी टोपा पहनकर ऐडल्ट अंग्रेजी फिल्में देखते और खुश होते कि उन्हें किसी ने भी पहचाना नहीं। उन्होंने देश के कई कार्यालयों में जाकर आवेदन दिये कि वे जासूसी जैसा होशियारी का कार्य भी वर्तमान नौकरी के साथ-साथ कर सकते है। सरकारी गैरसरकारी संगठनों में भी डाक से अपना बायोडेटा भेजते। लेकिन हुआ कुछ नहीं। वे अपनी नौकरी करते रहे शादी हुई बच्चे हुए लेकिन जासूस बनने का प्रयास कम किया पर छोड़ा नहीं। वक्त ने करवट ली। एक दिन ऑफिस में उनके वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें चेम्बर बुलाकर घूरते हुऐ कहा। बैठो, अभी तुम्हारे लिए फोन आया था, फिर आयेगा। अवधजी घबरा गये। सही में फोन की घंटी बज रही। थी, अफसर की निगाह कह रही थी कि लो बात कर लो सामने वाले ने बारूदी आवाज में ” अवधजी से कुछ कहा, परन्तु अवधजी ने सिर्फ इतना ही कहा जी ठीक है। आंखों पर पसीना छलक गया था। अफसर ने कहा सब ठीक तो है? फोन करने वाले के तेवर ठीक नहीं लग रहे थे। क्या गुन्डों से पाला पड़ा है। अवधजी ने यह कहकर पीछा छुड़ाया कि ऐसी कोई बात नहीं है।हकीकत में अज्ञात व्यक्ति ने अवधजी को शाम का नियत समय देकर किसी निजी गेस्ट हाउस में मिलने बुलाया था और हिदायत भी दे दी थी कि किसी से कुछ बताने की जरूरत नहीं है पत्नी से भी नहीं एक प्रलोभन जरूर दिया कि अवध तुम्हारे मतलब की बात है आना जरूर। अवधजी किसी बहाने से स्कूटर लेकर शाम को निर्देशित स्थान पर पहुँच गये । वहँ कुछ सरकारी गैर-सरकारी वाहन एवं कुछ पुलिस कर्मी भी नजर आये। यह सब देखकर अवधजी थोड़ा चिन्तित भी हुऐ। खैर बताये गये सूट क्रमांक का द्वार खटखटाया, अन्दर आने की इजाजत मिलते ही वे अन्दर दाखिल हो गये। वहाँ कुछ रूझाबदार चेहरे वाले पहलवाननुमा लोग सिर्फ टी-शर्ट, पाजामें में बैठे थे। ऐश ट्रे में बुझी हुई सिगरेटे एवं खाकी मग पड़े थे। अवधजी को लगा कि वे फंस चुके हैं उन्हें किसी भी बहाने भाग जाना चाहिये। अचानक एक खिचड़ी जैसे बालो वाले व्यक्ति ने नरमी से कहा ऐबीसी बैठ जाओ। चाय-पानी लो फिर काम की बात करेंगे। परन्तु डर के मारे अवधजी ने ना तो चाय पी और ना ही पानी. कुछ बोले भी नहीं। कुछ देर बाद वहाँ बैठे लोगों में से एक ने कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है, हमारा जीवन ही ऐसा है हम सरकार की इजाजत से ही नीजि जासूसी संस्थायें चलाते है। कई तरह की जानकारियाँ हासिल करते है। काफी समय पूर्व आपके एक आवेदन की प्रति किसी ने आपकी रूची देखते हुऐ हमें दे दी थी सो आपको बुला लिया। हम लोगों को वैद्य लायसेंस प्राप्त करके ही गोपनीय जानकारी हासिल करने की इजाजत होती है। हमारे साथ कई तरह के सेवारत एवं सेवानिवृत्त अधिकारी संगठन बनाकर कार्य करते हैं। अवधजी को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि अचानक ईश्वर ने उनकी मुराद पूरी कर दी। वही बातचीत में उन लोगों ने उन्हें बताया गया कि उनका नाम अब ऐवीसी रहेगा यदि वे उन्हें ज्वाईन करते है। उन्हें बताया गया कि उनकी वर्तमान नौकरी चलती रहेगी। जब-जब वे आफिस के कार्य से महानगर वाले हेड आफिस में जाते है। कार्य निपटाकर शाम शाम को जासूसी संगठन में कार्य कर सकेंगे। इस तरह शाम घूमने फिरने में कट जावेगी। जो जानकारी एकत्र करेंगे उसे सौंपकर कुछ रकम भी प्राप्त कर सकेंगे। उन्हें कोई जोखिम का काम नहीं दिया जायेगा जैसा फिल्मों में बताया जाता है। उन्हें आवश्यक मार्गदर्शन भी दिया जावेगा। शर्त मात्र यह थी कि हर जानकारी गुप्त रखी जावेगी। इसे गुप्तचरी के कार्य को छोड़ने के बाद भी कभी किसी से कोई जिक्र नहीं करेंगे। पत्नी, परिवार, मित्र काकटेल पार्टी में भी नहीं। अवधजी ने प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर लिया और कहा कि अगली बार हेड आफिस वाले शहर जावेंगे शाम शाम को गुप्तचरी का काम अवश्य सीखेंगे और करेंगे। रास आया तो ही कार्य करेंगे अन्यथा साफ-साफ मना कर देंगे। उनकी इस बात वे सभी लोग संतुष्ट हुऐ। अवधजी को एक फोन नम्बर दिया ताकि महानगर पहुँचने की खबर गुप्तचर सदस्यों को दे सकें। अवधजी घर लौट आये। कुछ माह बाद ही अवधजी को उनके आफिस के काम से अन्य महानगर स्थित हेड आफिस की शाखा में जाना पड़ा। पहले दिन ही ऑफिस का कार्य निपटा कर होटल लौट आये थोड़ा आराम किया। फिर वे किस्मत आजमाने दिये गये नम्बर से बात करके बताये पते पर पहुँच गये। वहाँ एक व्यक्ति मिला जो उनसे प्रथम मुलाकात में मिला था। औपचारिक बात के बाद उसने कहा कि वे इस शहर के नक्शे को समझे। एक इलाके की एक कॉलोनी में ही उनको काम करना होगा। अतः भविष्य में इसी कॉलोनी के पास की होटल में ठहरे तो उचित होगा । यहाँ आने के पूर्व कमरा बुक करा देंगे ऐसा उस व्यक्ति ने आश्वस्त कर दिया । रात्री को भोजन के बाद वह व्यक्ति जो कि निजी गुप्तचर संस्था का लोकल ऐजेन्ट था, अवधजी को पैदल घुमाते हुए पास की कॉलोनी में चक्कर कटाता रहा। अवधजी को समझता रहा कि उन्हें घूमते घूमते ही यहाँ खड़ी गये, स्कूटरों, मोटर सायकिल आदि के नम्बर नोट करना है । चलते चलते एक हाथ में पेड़ रखे दूसरे हाथ से लिखते चले, कहीं रूकने की जरूरत नहीं है। पर्ची फाड़कर जेब में रखते जावे रात्री में कमरे में पहुँच कर डायरी के पन्ने पर नोट कर लेवे। अपने शहर लौटने के पूर्व डायरी लोकल एजेन्ट को सौंपकर मेहनताना प्राप्त कर लेंवे। अब अवधजी ऐबीसी बन चुके थे। साल में चार पाँच बार ऐबीसी को कुछ दिनों के लिए हेड ऑफिस वाले महानगर जाना पड़ता था सो कुछ ही महीनों को ऐबीसी को लोकल एजेन्ट ने होशीयार गुप्तचर बना ही दिया। अब वे ज्यादा पेचीदा जानकारी प्राप्त करने में भी सक्षम हो गये थे। आमदनी तो थोड़ी बड़ी पर रोमांचक कार्य करने की प्रसन्नता काफी ज्यादा बढ़ गयी। यह सब करके ऐबीसी को अजीब आनन्द मिलता था। समय गुजरता गया अब वे अवकाश के दिनों में भी अन्य शहरों में भी गुप्तचरी के कार्य से चले जाते थे। मुख्यरूप से शादी पूर्व लड़के-लड़कियों की व्यक्तिगत जानकारी कॉलेज होस्टल लाईफ की जानकारी कभी-कभी तो मार्कशीट डिग्रियों को प्रमाणिकता भी पता करते। बिसनेस वालों की माली हालत भी पता कर ही लेते थे। कई जगह कार्य आसानी से हो जाता तो कहीं गुप्तचरी संस्था का पहचान पत्र दिखाना होता । स्थानीय पुलिस का सहयोग मिल जाता था। काफी वर्षों में ईमानदारी से कार्य करते रहने से प्रमोशन भी मिलते गये साथ ही ऐक्स्ट्रा कार्य गुप्तचरी में भी दक्षता बढ़ती रही। समय तो समय होता है, सेवानिवृत्ति का समय भी आ ही गया। निजी निवास में शिफ्ट हो गये। सेवानिवृत्ती भी शानदार तरीके से हुई। अब ऐबीसी और पत्नी शांति से जीवन गुजारने लगे। कुछ दिन तो सब कुछ ठीक ठाक चलता रहा। फिरउनको महानगर कैसे जावे यह समस्या सताने लगी। इसका भी रास्ता ऐबीसी ने निकाल लिया। एक दिन गंभीर मुद्रा में पत्नी से बोले की पूरा सिस्टम ही बिगड़ा हुआ है, पेंशन ऐसेशुरू नहीं होगी। मित्रों ने बताया कि हर माह हेड ऑफिस जाकर प्रयास करना पड़ेगा पैसा भी खर्च करना पडेंगे। तब कहीं पेंशन पे ऑर्डर प्राप्त होगा। पत्नी ने भी हाँ में हाँ कर दी। अब क्या था ऐबीसी को हर माह के बाद दो, तीन दिनों के लिए अपने गृह नगर से अन्य शहर जाने का मौका मिल जाता था। मनपसन्द शौक भी पूरा हो जाता था। एक दिन दोपहर भोजन के बाद पत्नी के साथ आराम कर रहे थे। उन्हें नींद लग गयी थी । उठे तो पत्नी ने कहा लो जी बधाई हो अभी रजिस्ट्री वाला पोस्टमेन पेंशन आर्डर दे गया है, शाम को मन्दिर चलेंगे। हकीकत में पेंशन आर्डर किसी अन्य शहर से आया था जहाँ ऐबीसी कभी गये नहीं थे। हालांकि पत्नी ने इस मुद्दे पर गौर नहीं किया। ऐबीसी पत्नी से बोले अब तो पेन्शन भी चालू हो जावेगी समय काटना भारी होगा उन्हें पूर्व से ही पोस्ट रिटायरमेंट प्लान करना था। पत्नी ने कहा मन्दिर चलेंगे ईश्वर ने चाहा तो ऐसा भी हो जावेगा। शाम को पति-पत्नी मंदिर हो आये ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। अगले दिन बैंक भी हो आये जहाँ पेन्शन आती थी। कुछ दिनों बाद पत्नी ने कहा कि उनके फूफाजी आने वाले है, वे पहली बार आ रहे है बुर्जुग व्यक्ति है क्यों आ रहे है पता नहीं। फूफाजी रिक्शे से घर आ गये। मिलना जुलना हुआ, औपचारिक बातें भी होती रही। ऐबीसी को जाने क्यों लगा कि कब और कहाँ इस व्यक्ति से मिले थे या उन्हें वहम हो रहा था।
रात्री को भोजन बाद फूफाजी ने कहा कि चलो ऐबीसी पान खाकर आते है। अवध बाबू बुरी तरह से चौंक गये। पत्नी ने मुसकुराकर कहा, घबराईये नहीं, फूफाजी सेवानिवृत्त सीआईडी अफसर है। इन्हीं से कह कर वर्षों पूर्व मैंने आपको मनपसन्द कार्य दिलाया था। मैंने आपकी एक फाईल में भेजे गये पत्रों की कार्बन प्रतियां देखी थी सो फूफाजी को बता दिया था। फूफाजी ने कहा था वे मदद करेंगे, परन्तु इस बात को गुप्त ही रखा जावे। फूफाजी ने कहा कि अब कहीं जाने की जरूरत नहीं इसी शहर में आपको गुप्तचरी का कार्य करना है। ऐबीसी शर्म से पानी-पानी हो रहे थे उनका पोस्ट रिटायरमेन्ट प्लान तो पत्नी ने ही वर्षों पूर्व करा दिया था। वे तय नहीं कर पा रहे थे कि बेहतर गुप्तचर कौन था वे या पत्नी ।

  • डॉ. एच. एस. राठौर

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