उज्जैनज़रा हटके

क्या पार्टियों में अब आतंरिक लोकतंत्र बढ़ेगा ?

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डेढ़ साल के अंतराल के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की वास्तविक बैठक हुई, जिसमें पार्टी के विभिन्न पदों के लिए आंतरिक चुनावों की घोषणा हुई है। ये चुनाव अगले साल अगस्त-सितंबर में होंगे। इन चुनावों में पार्टी-अध्यक्ष का चुनाव भी शामिल है। अच्छा हुआ कि इस बैठक में नए पार्टी-अध्यक्ष की घोषणा नहीं हुई। यदि हो जाती तो किस में दम था कि वह उसका विरोध करता? लेकिन सबसे अच्छा यह हुआ कि अब पार्टी अध्यक्ष चाहे अगले साल ही नियुक्त होगा लेकिन उसकी नियुक्ति ऊपर से नहीं होगी। वह नीचे से होगी। चुने हुए पार्टी अधिकारी उसे चुनेंगे।

पार्टी-अध्यक्ष के लिए पहले भी चुनाव की औपचारिकताएं पूरी की जाती रही हैं लेकिन पिछले 15-20 साल में क्या वाकई कोई कांग्रेस अध्यक्ष उस तरह से नियुक्त हुआ है, जैसे अमेरिका और ब्रिटेन आदि लोकतांत्रिक देशों में शुद्ध चुनाव के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं? इस प्रक्रिया की कमी कांग्रेस में ही नहीं, देश की लगभग सभी पार्टियों में देखी जाती है। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, उसके बाद उस पद को भरने के लिए कौनसा चुनाव हुआ है? कोई नहीं। राहुल की माता और पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दुबारा मोर्चा संभाल लिया याने कांग्रेस-अध्यक्ष घूम-फिरकर फिर उसी परिवार से आ गया।

लेकिन उसका फायदा क्या हुआ ? कांग्रेस 2019 का लोकसभा का चुनाव दुबारा हार गई। इतना ही नहीं, हरयाणा और असम में उसकी सरकारें गिर गईं, प. बंगाल ने उसे कूड़ेदान के हवाले कर दिया, मध्यप्रदेश में चलते-चलते वह लड़खड़ाकर गिर पड़ी। पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस-पार्टी के आंतरिक दंगल की खबरें गरमाती रहती हैं। संसद में वह सबसे बड़ा विरोधी दल है लेकिन उसकी आवाज़ सुनाई ही नहीं पड़ती है। भाजपा सरकार निरंकुश हाथी की तरह मस्ताना चाल में चली जा रही है।

यदि राहुल गांधी का 2019 में इस्तीफा नहीं होता तो वे 2022 तक कांग्रेस अध्यक्ष बने रहते। पिछले 5 साल से कांग्रेस कार्यकारी याने कामचलाऊ अध्यक्ष से काम चला रही है। कांग्रेस से कोई पूछे कि आपका काम कौन चला रहा है तो उसके पास कोई दो-टूक जवाब नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि वह चाहे तो एक तीन-टूक जवाब दे सकती है याने कांग्रेस-पार्टी का संचालन तीन लोग कर रहे हैं- माँ, बेटा और बेटी। याने सोनिया, राहुल और प्रियंका ! इस रहस्य को समझना हो तो आप पंजाब की उठापटक पर गौर कीजिए और पूछिए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलौत से और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से। कांग्रेस में इस समय सत्ता के तीन-तीन केंद्र काम कर रहे हैं।

कार्यसमिति की ताजा बैठक में सोनिया गांधी को अपने भक्तों के उक्त ‘भ्रम’ को मजबूर होकर दूर करना पड़ा। उन्होंने कहा कि वे पूर्णकालिक अध्यक्ष हैं और वे अपना काम डटकर कर रही हैं। मोदी सरकार के गलत कामों का वे डटकर विरोध कर रही हैं। उन्होंने तीनों किसान-विरोधी ‘काले कानूनों’ पर जमकर मोर्चा लिया है। उन्होंने लखीमपुर-खीरी हत्याकांड, सरकारी संपत्तियों के विक्रय, जम्मू-कश्मीर में हुई अल्पसंख्यकों की हत्या और विदेश नीति के मामलों में भी सरकारी अकर्मण्यता पर ताीखे सवाल उठाए हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि अगले कुछ ही महिनों में होनेवाले विधानसभा चुनावों के लिए भी हमने जमकर तैयारी शुरु कर दी है। उन्हें विश्वास है कि कांग्रेस को काफी सफलता मिलेगी।

लेकिन कांग्रेस के साधारण कार्यकर्ताओं से अगर आप पूछें कि इन आगामी चुनावों में कांग्रेस की सफलता के बारे में आपका ख्याल क्या है? तो वे चुप रहना ही ज्यादा पसंद करेंगे। कार्यसमिति की इस बैठक से उन्हें बहुत आशा थी लेकिन हुआ क्या? वही ढाक के तीन पात! जिन 23 नेताओं ने पार्टी-सुधार के लिए सोनियाजी को खुला पत्र लिखा था और यह भी कहा था कि वे ‘जी-हुजूर’ नहीं हैं, उनकी बोलती भी बंद रही। सभी कांग्रेसी मुख्यमंत्री राहुल से अध्यक्ष बनने की मांग करते रहे। यदि राहुल की तैयारी होती तो सोनियाजी अपनी कुर्सी तुरंत खाली कर देतीं। सारा देश त्यागमूर्ति के रुप में उनका आदर करता है। वे चाहतीं तो 2014 में ही प्रधानमंत्री बन सकती थीं लेकिन डाॅ. मनमोहन सिंह को वह पद उन्होंने सौंप दिया। वैसा ही संकोच अब राहुल को भी होता हुआ दिखाई पड़ रहा है। सारे बुजुर्ग कांग्रेसियों की मिन्नतों के बावजूद वे कांग्रेस का अध्यक्ष पद लेने के लिए राहुल की हाँ नहीं करवा पाए।

लेकिन यहां सवाल यह भी है कि यदि सोनिया गांधी पूर्णकालिक अध्यक्ष हैं तो राहुल गांधी का नाम इस समय क्यों उछाला गया? सोनियाजी ने उन 23 नेताओं को आड़े हाथों लिया, जिन्होंने पूर्णकालिक अध्यक्ष की मांग की थी। उन्होंने कहा कि पार्टी के आंतरिक मामलों को धोबीघाट पर ले जाकर पछाड़ने की जरुरत नहीं है। वे सभी वरिष्ठ नेता फिर से राहुल गांधी की बीन बजाने लगे। किसी ने भी हिम्मत नहीं की कि वह कांग्रेस के अध्यक्ष के चुनाव की पद्धति को मूल रुप से बदलने की वकालता करता। यदि कांग्रेस के करोड़ों कार्यकर्ता सीधे चुनाव के द्वारा अपना अध्यक्ष चुनें तो कांग्रेस फिर से एक जानदार पार्टी बन सकती है। इतना ही नहीं, इसका असर दूसरी सभी पार्टियों पर भी पड़ेगा। इस समय देश की सभी पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह बन गई हैं। उनमें आंतरिक लोकतंत्र शून्य होता जा रहा है। वे सब इंदिरा गांधी के ढर्रे पर ढलती जा रही हैं। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए गहन चिंता का विषय है।

इस समय कांग्रेस ही ऐसी एकमात्र विरेाधी पार्टी है, जो सचमुच अखिल भारतीय है। उसकी गिरी-पड़ी हालत हो गई है, इसके बावजूद देश का शायद ही कोई जिला होगा, जहां आपको कांग्रेस के कार्यकर्ता नहीं मिलेंगे। लेकिन यह भी सत्य है कि कांग्रेस के कई कार्यकर्ता और कुछ नामी-गिरामी नेता भी अन्य विरोधी पार्टियों में शामिल होते जा रहे हैं। यही राजनीतिक प्रक्रिया देश में जारी रही तो अगले पांच-सात साल में चीन और रूस की तरह भारत में भी एक नेता, एक नारा और एक पार्टी का राज हो जाएगा। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जानेवाले भारत को इस विभीषिका से बचाने की पूरा प्रयत्न करना होगा।

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