उज्जैनज़रा हटके

अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन

जलवायु संकट से निपटने के लिए अमीर देशों के रवैए को लेकर भारत की चिंता
गैरवाजिब नहीं है। ग्लासगो में चल रहे अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलन
(सीओपी 26) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछड़े देशों की मदद की
वकालत की और अमीर देशों को स्पष्ट संदेश दिया कि धरती को बचाने की अपनी
जिम्मेदारी से वे बच नहीं सकते। दरअसल कार्बन उत्सर्जन घटाने के मुद्दे
पर अमीर देशों का जैसा रुख बना हुआ है, वह इस संकट को और बढ़ाने वाला ही
नजर आता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि शून्य कार्बन उत्सर्जन का
लक्ष्य आखिर हासिल कैसे होगा। गौरतलब है कि जलवायु संकट से निपटने के लिए
विकसित देशों को गरीब मुल्कों की मदद करनी थी। इसके लिए 2009 में एक
समझौता भी हुआ था, जिसके तहत अमीर देशों को हर साल सौ अरब डालर विकासशील
देशों को देने थे।

खुदकुशी की दर में बढ़ोतरी

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े चिंता पैदा करने वाले हैं।
कोरोना काल में दिहाड़ी मजदूरों, कारोबारियों, किसानों आदि की खुदकुशी की
दर में अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज हुई। दिहाड़ी मजदूरों ने सबसे अधिक 24.6
प्रतिशत खुदकुशी की। उसके बाद दूसरे स्थान पर घरेलू महिलाओं और तीसरे
स्थान पर कारोबारियों की खुदकुशी के आंकड़े दर्ज हुए। इसकी कुछ वजहें
स्पष्ट हैं। कोरोना काल में लंबे समय तक काम-धंधे बंद रहे, जिसकी वजह से
लाखों की संख्या में दिहाड़ी मजदूरों के सामने जीविकोपार्जन का संकट खड़ा
हो गया। पहली लहर के दौरान जब बंदी घोषित हुई तो तमाम महानगरों और
औद्योगिक शहरों से दिहाड़ी मजदूरों, कल-कारखानों में कच्चे-पक्के काम करने
वालों और रेहड़ी-पटरी पर कारोबार करने वाले जत्थे में अपने पैतृक स्थानों
की ओर लौटते देखे गए। हालांकि सरकारों ने अपील की थी कि किसी को भी पलायन
करने की जरूरत नहीं, उनके भोजन का प्रबंध किया जाएगा, मगर उसका बहुत असर
उन पर नहीं पड़ा था। कामकाज छिन जाने की वजह से ऐसे बहुत सारे लोगों ने
मौत को गले लगा लिया।

चीन का नया दांव

चीन ने हाल में जो नया सीमा कानून बनाया है, उसका मकसद कोई छिपा नहीं है।
इस कानून के प्रावधानों से पहली नजर में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वह
जिस जमीन पर पैर रख देगा, वह उसी की हो जाएगी। यह नया कानून एक जनवरी
2022 से लागू हो जाएगा। गौर करने वाली बात यह है कि चीन ने यह पैंतरा ऐसे
वक्त में चला है जब भारत के साथ उसका विवाद चल रहा है और इसे लेकर अक्सर
ही तनाव तथा टकराव की स्थितियां बनती रही हैं। चीन का दावा है कि उसने
अपनी सीमा से लगते बारह देशों के साथ तो सीमा विवाद सुलझा भी लिए हैं।
ऐसे में अब भारत और भूटान ही बचे हैं जिनके साथ विवाद का समाधान निकालना
है। गौरतलब है कि भूटान की तुलना में भारत के साथ चीन का सीमा विवाद कहीं
ज्यादा पेचीदा और गंभीर है। समय-समय पर होते आए टकरावों ने इसे और बिगाड़
दिया है। ऐसे में नए भूमि कानून का इस्तेमाल चीन कैसे और कब करेगा, इसमें
किसी कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

पर्यावरण सम्मेलन का महत्त्व

पर्यावरण बचाने के लिए हर साल की तरह इस बार भी दुनिया के तमाम छोटे-बड़े
देश ब्रिटेन के ग्लासगो में जुटे हैं। सीओपी (कांफ्रेंस आॅफ पार्टीज) 26
सम्मेलन में सभी देश एक बार फिर इस मुद्दे पर गहन चर्चा करेंगे कि कार्बन
उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य को कैसे हासिल किया जाए। इसमें कोई संदेह
नहीं कि धरती का पर्यावरण लगातार बिगड़ रहा है। वैज्ञानिक और पर्यावरणविद
चेतावनी दे रहे हैं कि आने वाले दशकों में वैश्विक तापमान और बढ़ेगा।
इसलिए अगर दुनिया अब भी नहीं चेती तो इक्कीसवीं सदी को भयानक आपदाओं से
कोई नहीं बचा पाएगा। ग्लासगो में हो रहे इस पर्यावरण सम्मेलन का महत्त्व
इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि अब पर्यावरण बिगाड़ने के जिम्मेदार देशों को
भविष्य का खाका तैयार करना है। उन्हें बताना है कि कार्बन उत्सर्जन घटाने
के लिए वे क्या करने जा रहे हैं।

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